शुक्रवार, 14 मई 2021

भारत की पहचान

अनादि कल से ही भारतवर्ष दुनिया का केंद्र रहा है।भारत हजारों सालों का इतिहास अपने में समेटे हुए है। धर्म, शिक्षा, व्यापार, योग स्वास्थय, अर्थशास्त्र, विज्ञान इत्यादि अनेको विषयो में भारत को महारत हासिल थी।


     गुलामी की जकड़ की वजह से भारत अपना अस्तित्व अपनी पहचान भूल चुका है। अपनी मूल संस्कृति " सनातन संस्कृति " की परंपराओं को विस्मृत करने का दंड 

भारत को इस प्रकार मिला है कि आज भारत को दुबारा अपनी पहचान दुनिया में स्थापित करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। 1000 साल की गुलामी ने भारतवर्ष को पूरी तरह झकझोर दिया है। विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।


     कुछ समय से भले कुछ संतोष जरूर मिला है कि भारत 

अपनी पहचान और स्वाभिमान साबित करने में काफी सफलता भी मिली है। भारत को निरंतर अपने पड़ोसियों खासकर चीन व पाकिस्तान से खतरा भी उठाना पड़ा है।

सबसे बड़ा खतरा जो भारत को वर्तमान में है, वो बाह्य चुनौतियों को छोड़ दे तो आंतरिक राजनैतिक और सामाजिक समस्याओ से है। जैसे कि आपस में राजनैतिक द्वेष, वामपंथी विचारधारा, नक्सली आतंकवाद, अति सहिष्णुता, देशद्रोही विचारधारा, अलगाववाद आदि।


     दुसरी तरफ चीन जो कि पूरी दुनिया के लिए एक खतरा बन चुका है, भारत इसमें सबसे पहले नंबर पर है। कही न कही पूरी दुनिया को अब लगने लगा है कि भारत अब अपना खोया हुआ सम्मान पाने की राह में तेजी से बढ़ चला है। भारत का बढ़ता हुआ वर्चस्व कुछ देश पचा नहीं पा रहे है। इस सूची में श्रेणी देशों जैसे कि अमेरिका, चीन,

यूरोप, पाकिस्तान, रूस इत्यादि है। भारत का बढ़ता वर्चस्व इसलिए भी दुनिया को खटकता है क्युकी भारत अपने सनातन रूप में पहचान बना रहा है।

 

      अंत में यह ही निष्कर्ष निकलता है कि अगर भारत को पहले की तरह ही विश्वगुरु बनना है तो एक दृढ़ संकल्प, दृढ़ इच्छाशक्ति से कठोर रणनीति के तहत अपने दुश्मनों का सामना करना होगा। इसमें कुछ कठोर उदाहरण भी पेश करने पड़ सकते है जैसा कि इजरायल ने भी किया है। 

भारत को राजनीति से ऊपर उठकर तेजी विकास प्रक्रिया में भाग लेना पड़ेगा। यदि भारत इन सब मापदंडो पर खरा उतरता है तो निश्चित ही भारत विश्वगुरु बनेगा और पूरे मानव जाति का मार्गदर्शन करेगा।


जय हिंद।            




मंगलवार, 29 सितंबर 2020

मुगल काल 1

 बाबर ने मुश्किल से कोई 4 वर्ष राज किया। हुमायूं को ठोक पीटकर भगा दिया। मुग़ल साम्राज्य की नींव अकबर ने डाली और जहाँगीर, शाहजहाँ से होते हुए औरंगजेब आते आते उखड़ गया।


कुल 100 वर्ष (अकबर 1556ई. से औरंगजेब 1658ई. तक) के समय के स्थिर शासन को मुग़ल काल नाम से इतिहास में एक पूरे पार्ट की तरह पढ़ाया जाता है....


मानो सृष्टि आरम्भ से आजतक के कालखण्ड में तीन भाग कर बीच के मध्यकाल तक इन्हीं का राज रहा....!


अब इस स्थिर (?) शासन की तीन चार पीढ़ी के लिए कई किताबें, पाठ्यक्रम, सामान्य ज्ञान, प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रश्न, विज्ञापनों में गीत, ....इतना हल्ला मचा रखा है, मानो पूरा मध्ययुग इन्हीं 100 वर्षों के इर्द गिर्द ही है।


जबकि उक्त समय में मेवाड़ इनके पास नहीं था। दक्षिण और पूर्व भी एक सपना ही था।


अब जरा विचार करें..... क्या भारत में अन्य तीन चार पीढ़ी और शताधिक वर्ष पर्यन्त राज्य करने वाले वंशों को इतना महत्त्व या स्थान मिला है ?


अकेला विजयनगर साम्राज्य ही 300 वर्ष तक टिका रहा। हीरे माणिक्य की हम्पी नगर में मण्डियां लगती थीं।महाभारत युद्ध के बाद 1006 वर्ष तक जरासन्ध वंश के 22 राजाओं ने । 5 प्रद्योत वंश के राजाओं ने 138 वर्ष , 10 शैशुनागों ने 360 वर्षों तक , 9 नन्दों ने 100 वर्षों तक , 12 मौर्यों ने 316 वर्ष तक , 10 शुंगों ने 300 वर्ष तक , 4 कण्वों ने 85 वर्षों तक , 33 आंध्रों ने 506 वर्ष तक , 7 गुप्तों ने 245 वर्ष तक राज्य किया ।


फिर विक्रमादित्य ने 100 वर्षों तक राज्य किया था । इतने महान् सम्राट होने पर भी भारत के इतिहास में गुमनाम कर दिए गए ।


उनका वर्णन करते समय इतिहासकारों को मुँह का कैंसर हो जाता है। सामान्य ज्ञान की किताबों में पन्ने कम पड़ जाते है। पाठ्यक्रम के पृष्ठ सिकुड़ जाते है। प्रतियोगी परीक्षकों के हृदय पर हल चल जाते हैं।


वामपंथी इतिहासकारों ने नेहरूवाद का मल भक्षण कर, जो उल्टियाँ की उसे ज्ञान समझ चाटने वाले चाटुकारों तुम्हे धिक्कार है !!!


यह सब कैसे और किस उद्देश्य से किया गया ये अभी तक हम ठीक से समझ नहीं पाए हैं और ना हम समझने का प्रयास कर रहे हैं।


एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत हिन्दू योद्धाओं को इतिहास से बाहर कर सिर्फ मुगलों को महान बतलाने वाला नकली इतिहास पढ़ाया जाता है। महाराणा प्रताप के स्थान पर अत्याचारी व अय्याश अकबर को महान होना लिख दिया है। अब यदि इतिहास में हिन्दू योद्धाओं को सम्मिलित करने का प्रयास किया जाता है तो कांग्रेस शिक्षा के भगवा करण करने का आरोप लगाती है।

मंगलवार, 19 जून 2018

भारत या India

अपने देश को हम भारत, हिंदुस्तान और इंडिया इन तीनों नामों से बुलाते हैं। क्या है इन नामों का इतिहास और किस तरह की समझ और भावनाएं जुड़ी हुई हैं इन तींनों नामों से?

क्या वही हिन्दुस्तान, भारत था? क्या आज का इंडिया उससे अलग है? क्या इंडिया बदल गया है और उसने भारत को बदल दिया है?


भारत बना है भा-र-त से मिलकर। जिसमें ‘भा’ का मतलब है- भाव। सुनना, देखना, चखना, सूंघना व स्पर्श करना अलग-अलग तरह के भाव या संवेदनाएं हैं। जीवन के प्रति आपका पूरा अनुभव फि लहाल इंद्रियों पर आधारित है। दूसरे शब्दों में कहें तो आप की संवेदनाएं ही आपके अनुभवों के आधार हैं। भा का मतलब है, भाव या संवेदना, जिससे भावनाएं उत्पन्न होती हैं। ‘रा’ का आशय राग से है। यह राग आपका नहीं है, सृष्टि ने इसे पहले ही तैयार कर रखा है। अब बस आपको वो लय ढूंढनी है, जो ‘त’ यानी ताल हुई। अगर आपको सही लय या ताल मिल गई तो आप एक शानदार इंसान हैं। अगर आप इस लय से चूक गए तो जीवन प्रक्रिया आपको रौंद देगी।



हम लोग इस देश को भारत कहते हैं। इस देश के इतिहास में महान शासकों में एक शासक भरत हुए हैं। कहते हैं कि इस देश का नाम उनके नाम पर भारत पड़ा।

देश का नाम भारत से बदलकर इंडिया रखना एक गंभीर गलती थी। जब भी कोई आक्रमणकारी किसी देश को जीतता है तो सबसे पहले वह उसका नाम बदल देता है। यह लोगों पर प्रभाव जमाने की और उन्हें गुलाम बनाने की तकनीक है।
लेकिन असलियत में उनका नाम ‘भरत’ इस देश के नाम पर पड़ा। यहां इतने ज्यादा भरत, भारत और भारती हुए हैं, जिनका नाम इस देश के नाम पर रखा गया। राजा भरत के नौ बेटे थे, लेकिन जब राज्य का उत्तराधिकार सौंपने की बात आई तो उन्होंने अपना राज्य भूमन्यु को दिया, जो भारद्वाज ऋषि का पुत्र था। यह बालक जंगल में बड़ा हुआ था। जब वह पहली बार राजदरबार में आया तो राजा ने उसे देखते ही कहा कि इसी बच्चे को राजा बनना चाहिए, मेरे बेटों को नहीं। लोगों ने जब यह सुना तो वे हैरान रह गए। दरअसल, राजा के नौ पुत्र न सिर्फ अपने राज्याभिषेक की प्रतीक्षा कर रहे थे, बल्कि उनमें से कौन राजा बनेगा, इसे लेकर आपस में लड़ भी रहे थे। लोगों ने सवाल किया- ‘यह कौन है? यह तो जंगल में पलकर बड़ा हुआ है।’ इस पर भरत ने जवाब दिया- ‘मैं उसकी आंखों में एक जबदस्त प्रतिभा और उसके दिल में एक धधकती हुई आग देख रहा हूं। यह एक सुयोग्य और स्थिर-चित्त बालक है। इसलिए इसी को राजा होना चाहिए।’ हजारों साल पहले घटित यह घटना इस देश में लोकतंत्र का पहला उदाहरण था। मुझे उम्मीद है कि हम आज इसका अनुसरण करते हैं।

अपने देश का नाम भारत से बदलकर इंडिया करने में क्या हमने गलती की?

देश का नाम भारत से बदलकर इंडिया रखना एक गंभीर गलती थी। जब भी कोई आक्रमणकारी किसी देश को जीतता है तो सबसे पहले वह उसका नाम बदल देता है। यह लोगों पर प्रभाव जमाने की और उन्हें गुलाम बनाने की तकनीक है। अगर आप अफ्रीकी-अमेरिकी इतिहास पर नजर डालें तो जब अफ्रीकी लोग अमेरिका लाए गए तो सबसे पहले अमेरिकियों ने उनका नाम छीन कर उन्हें कोई मूर्खतापूर्ण नाम दे दिया। कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी किया गया। तिरुअनंतपुरम, त्रिवेंद्रम हो गया और चेन्नै मद्रास। अंग्रेजी में बोलेंगे तो इसका उच्चारण होगा ‘मैडरास’ अब हमें पता नहीं कि हम ‘मैड’ यानी पागल हैं या फि र ‘रास्कल’ यानी धूर्त। इसी तरह देश का नाम इंडिया हो गया।

भा का मतलब है, भाव या संवेदना, जिससे भावनाएं उत्पन्न होती हैं। ‘रा’ का आशय राग से है। यह राग आपका नहीं है, सृष्टि ने इसे पहले ही तैयार कर रखा है। अब बस आपको वो लय ढूंढनी है, जो ‘त’ यानी ताल हुई।
आखिर इसका मतलब क्या है? इसका कोई मतलब नहीं है। अगर मैं आपको एक अर्थहीन नाम दूं तो आप मेरे सामने एक अर्थहीन और मूर्ख इंसान बन जाएंगे, क्योंकि मेरे पास एक अर्थपूर्ण नाम है, मेरे पास एक परंपरा है, एक संस्कृति है- आपके पास कुछ नहीं है। तो इस संदर्भ में हम इंडिया हो गए।
किसी भी देश की अवधारणा हरेक व्यक्ति के दिलोदिमाग में उतरनी जरूरी है, क्योंकि कोई भी देश सिर्फ एक विचार भर है। जब यह विचार आपके दिमाग में कौंधता है और आपके दिल में उतरता है और फिर जब भावनाएं जागती हैं तो वह सच्चा देश कहलाता है। वर्ना तो राष्ट्र महज कागजों पर होते हैं। आज यह हमारे लिए यह एक दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है।
1947 में अंग्रेजों के भारत छोडने के बाद सबसे पहला काम जो हमें करना चाहिए था, वह था इसका नाम बदलना। हमें इसका नाम इस तरह बदलना चाहिए था, ताकि यह हरेक देशवासी के दिल व दिमाग में गूंज सके। आज आप भारतीय देश के लिए एक अंग्रेजी नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस देश में महज कुछ प्रतिशत लोग ही ठीक से अंग्रेजी बोल सकते हैं। जबकि बाकी सब इससे बचे हुए हैं। मैं देश के मौजूदा प्रधानमंत्री से एक गुजारिश करना चाहूंगा कि हमें अपने देश का फिर से ऐसे नाम बदल देना चाहिए, ताकि वो नाम यहां के हरेक देशवासी के दिल में धडक़ने लगे।
मुझे पता है कि बौद्धिक लोगों का एक बड़ा तबका कहने लगेगा, ‘आखिर नाम में क्या रखा है?’ ठीक है, तो आप अपना नाम टोबू या मोमो रख लीजिए। हालांकि लोग ऐसा कर रहे हैं। मैं किसी भी चीज के खिलाफ नहीं हूं। मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि जब आप अपने नाम का उच्चारण करते हैं तो उस नाम के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक मायने तो होते ही हैं, साथ ही उस ध्वनि का अपना एक अस्तित्व और ताकत भी होती है। ‘भारत’ में एक ताकत है। यह ताकत इस देश के हरेक वासी के दिल में गूंजनी चाहिए। एक भारतीय होने का मतलब यानी जो मूल भाव है, वह हरेक देशवासी के भीतर उभरना चाहिए। क्योंकि अगर हरेक देशवासी की आकांक्षाएं देश की आकांक्षाओं से नहीं मिलेंगी तो फिर वो देश, देश नहीं होगा।

अगर हम इंडिया को ‘भारत’ कहना शुरू कर दें तो क्या यहां महिलाएं खुद को पहले से ज्यादा सुरक्षित महसूस करना शुरू कर देंगी? आप तो जानते ही हैं कि अपने यहां महिलाओं के साथ कैसा बर्ताव हो रहा है, खासकर ग्रामीण भारत और समाज के कमजोर तबकों में।

ऐसा नहीं है कि नाम ही सबकुछ करेगा, लेकिन नाम लोगों में देश के प्रति भावना व प्रेरणा जगाने का काम करता है। फिलहाल तो उनमें सिर्फ हारमोन जनित भावनाएं ही काम कर रही हैं, देश के लिए किसी तरह की भावनाएं नहीं हैं। इसलिए महिलाओं के साथ इस तरह की घटनाएं घट रही हैं।
एक देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आप अपनी पसंद-नापसंद से आगे जाकर अपने जूनुन, जुड़ाव, और सरोकारों का विस्तार करते हैं। आप पूछ सकते हैं कि ‘हम पूरी दुनिया के बारे में ऐसा क्यों नहीं सोच सकते?’ एक आध्यात्मिक व्यक्ति होने के नाते मैं कोई राष्ट्रवादी इंसान नहीं हूं। मैं इस धरती के हर इंसान, हर प्राणी को एक ही भाव या नजर से देखना चाहूंगा। मैं ऐसा ही हूं। लेकिन कोई भी देश मानवता का एक बड़ा हिस्सा है और जिसके प्रति फिलहाल आप समर्पित हो सकते हैं। जब आप इस देश व उसके कल्याण के प्रति समर्पित होते हैं तो आप भले ही दुनिया के सवा सात अरब लोगों के प्रति समर्पित न हो रहे हों, लेकिन कम से कम सवा अरब लोगों के प्रति तो समर्पित होते ही हैं। अपने निजी व्यक्तित्व के प्रति समर्पित होने की अपेक्षा इतनी बड़ी मानवता के प्रति समर्पित होना एक महान कदम होगा..

भारत की पहचान

अनादि कल से ही भारतवर्ष दुनिया का केंद्र रहा है।भारत हजारों सालों का इतिहास अपने में समेटे हुए है। धर्म, शिक्षा, व्यापार, योग स्वास्थय, अर...